एक शाम सैर को निकले
गलियां सुनसान थीं कूचे सुनसान थे
रास्ते तो ऐसे खाली पड़े थे
जैसे आने वाले कोई तूफान थे
थोड़ा आगे चले तो समझ पड़ा कि
मंत्री जी के रूप में आए शहर के मेहमान थे
वो तो कुर्सी मचकाए आधी नींद में पड़े थे
और लाऊड स्पीकर में हो रहे उनके गुणगान थे
कहीं खलल उनकी नींद में ना हो जाए
इसलिए घेरे उनको खड़े कई पहलवान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
मन्दिर के बाहर हो रहे कुछ विधान थे
बीच में आग जल रही थी और
चारों तरफ़ पंडित लोग विराजमान थे
जाप तो वो मंत्रों का कर रहे थे पर
आने वाले चढावों पर उनके ज्यादा ध्यान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
कच्ची बस्ती में कुछ टूटे फूटे मकान थे
बाहर बच्चे नंगे भीख मांग रहे थे पर
हर घर में टीवी फ्रीज जैसे सामान थे
मासूम बेचारे हाथ फैलाये खड़े थे
और गालों पे उनके आसूँओ के निशान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा की
शहर के बाहर खेत और खलियान थे
औरतें कुँए पर पानी भर रही थीं
और अपने हल को ले के जुटे कुछ किसान थे
उनकी मेहनत से खेत ऐसे लहलहा रहे थे
जैसे कृष्ण की रासलीला के लिए बने ये ही उद्यान थे
थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
सड़क के एक तरफ़ जंगल और एक तरफ़ शमशान थे
चलते चलते ठोकर लगी एक हड्डी से
तो हड्डी के ऐसे कुछ बयान थे
कि संभल के चलो ए इंसान
हम भी कभी इंसान थे
Thursday, July 16, 2009
Friday, July 10, 2009
कौन जला है
चिता ही कह देती है कौन जला है
उठती हुई लपटे पुण्य है उसका
बची हुई राख किए पाप
निकलती गर्मी दबी इच्छाएं हैं मन की
अधजली हड्डियाँ बचे काम
चिता ही कह देती है कौन जला है
लगी लकडियाँ लिया गया क़र्ज़
ढोला गया घी दिया उधार
चढाये गए फूल समाज हैं उसका
उडाये कफ़न उसके लिए प्यार
चिता ही कह देती है कौन जला है
चमकती चिंगारियां गुस्सा हैं उसका
उड़ता धुआं मन का गुबार
चटकते कोयले टूटते सपने हैं उसके
फैलती रौशनी उसका अंहकार
चिता ही कह देती है कौन जला है
उठती हुई लपटे पुण्य है उसका
बची हुई राख किए पाप
निकलती गर्मी दबी इच्छाएं हैं मन की
अधजली हड्डियाँ बचे काम
चिता ही कह देती है कौन जला है
लगी लकडियाँ लिया गया क़र्ज़
ढोला गया घी दिया उधार
चढाये गए फूल समाज हैं उसका
उडाये कफ़न उसके लिए प्यार
चिता ही कह देती है कौन जला है
चमकती चिंगारियां गुस्सा हैं उसका
उड़ता धुआं मन का गुबार
चटकते कोयले टूटते सपने हैं उसके
फैलती रौशनी उसका अंहकार
चिता ही कह देती है कौन जला है
Wednesday, July 8, 2009
दे दो
मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो
रोक नही पा रहा हूँ आकाल से त्रस्त उन्माद को हृदय में
मुझे अपने स्पर्श से उत्पतित थोडी नमी दे दो
कही तुमने अपने करों के द्वार फैलाये तो होंगे
भीतर आने को व्याकुल मुझे आतुर रौशनी दे दो
संघर्षों के फेर में भटके अपरिचित घोषित हो चुका हूँ
अब तो आगंतुक दृष्टि में विचरित चांदनी दे दो
सिमित नही होता है किसी की आशाओं का पोखर
भर सकूं जहाँ उज्जवल निधि वहीं दे दो
मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो
रोक नही पा रहा हूँ आकाल से त्रस्त उन्माद को हृदय में
मुझे अपने स्पर्श से उत्पतित थोडी नमी दे दो
कही तुमने अपने करों के द्वार फैलाये तो होंगे
भीतर आने को व्याकुल मुझे आतुर रौशनी दे दो
संघर्षों के फेर में भटके अपरिचित घोषित हो चुका हूँ
अब तो आगंतुक दृष्टि में विचरित चांदनी दे दो
सिमित नही होता है किसी की आशाओं का पोखर
भर सकूं जहाँ उज्जवल निधि वहीं दे दो
मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो
Saturday, January 24, 2009
मकान
अधूरा बना मकान
ईंट रेत पत्थरों से मिलकर
सुंदर पौधों की छोटी क्यारिओं से घिर कर
अपने बगीचे को एक - टक निहारता
अधूरा खड़ा मकान
अपने आँगन में नन्हे पैरों के निशानों से सज कर
अपनी दीवारों को पेंसिल के चित्रों से भर कर
बचपन के कोमल हाथों को थामे
आसमान से बड़ा मकान
अधूरा खड़ा मकान
अपने दरवाजों पर राखी के धागों से बंध कर
अपनी डोलियों पर दिवाली के दीयों को रख कर
किसी की भावनाओं से अंत तक जुडा मकान
अधूरा खड़ा मकान
अपने चौखट पर रंगीन माडनों को सहेज कर
अपनी दीवारों में लज़ीज़ पकवानों की खुशबु को समेट कर
हर त्यौहार के लिए बेसब्री से
इंतज़ार में खड़ा मकान
अधूरा बना मकान
ईंट रेत पत्थरों से मिलकर
सुंदर पौधों की छोटी क्यारिओं से घिर कर
अपने बगीचे को एक - टक निहारता
अधूरा खड़ा मकान
अपने आँगन में नन्हे पैरों के निशानों से सज कर
अपनी दीवारों को पेंसिल के चित्रों से भर कर
बचपन के कोमल हाथों को थामे
आसमान से बड़ा मकान
अधूरा खड़ा मकान
अपने दरवाजों पर राखी के धागों से बंध कर
अपनी डोलियों पर दिवाली के दीयों को रख कर
किसी की भावनाओं से अंत तक जुडा मकान
अधूरा खड़ा मकान
अपने चौखट पर रंगीन माडनों को सहेज कर
अपनी दीवारों में लज़ीज़ पकवानों की खुशबु को समेट कर
हर त्यौहार के लिए बेसब्री से
इंतज़ार में खड़ा मकान
अधूरा बना मकान
Tuesday, January 20, 2009
आत्महत्या
क्यों किसी को कहना पड़ता है?
बस रास्ता अब मौत है
क्यों किसी को सहना पड़ता है?
जिस का जिंदगी को भी खौफ है
कि बिच्छुओं के डंक सी चुभती होगी जिन्दगी
या फडफडाती होगी उलझी हुई पतंग सी जिंदगी
और सोचती होगी कि ये किसके मोहपाश में फंसी हूँ मैं
ऐसा कौनसा छोर है जिसके लिए बची हूँ मैं
फ़िर गिर जाती होगी ये ही कहते हुए
कि छोड़ दो ये मुट्ठीयां और जाने दो मुझे
इतना सताया तो मैंने तुम्हे
क्यों बैठे हो अब भी मुझे पकड़े हुए
तो क्या ऐसी ही विडम्बना कि देहरी पर बैठे
वो अपना जन्म घुट - घुट के जिया करता है?
इसलिए तो शायद कोई...
इसलिए तो शायद कोई आत्महत्या किया करता है
बस रास्ता अब मौत है
क्यों किसी को सहना पड़ता है?
जिस का जिंदगी को भी खौफ है
कि बिच्छुओं के डंक सी चुभती होगी जिन्दगी
या फडफडाती होगी उलझी हुई पतंग सी जिंदगी
और सोचती होगी कि ये किसके मोहपाश में फंसी हूँ मैं
ऐसा कौनसा छोर है जिसके लिए बची हूँ मैं
फ़िर गिर जाती होगी ये ही कहते हुए
कि छोड़ दो ये मुट्ठीयां और जाने दो मुझे
इतना सताया तो मैंने तुम्हे
क्यों बैठे हो अब भी मुझे पकड़े हुए
तो क्या ऐसी ही विडम्बना कि देहरी पर बैठे
वो अपना जन्म घुट - घुट के जिया करता है?
इसलिए तो शायद कोई...
इसलिए तो शायद कोई आत्महत्या किया करता है
Friday, December 19, 2008
धमाके
इक धमाके से कैसे बदल जाती है जिंदगी
कांच के टुकडो की तरह बिखर जाती है जिंदगी
अपने काम को जाते लोग पलट जाते हैं
जाने वो लोग कौन हैं जो ऐसा करने निकल आते हैं
मेरे गांव में भी हुआ था धमाका
जहाँ मेरा घर था उस सड़क के किनारे
सूख गयी थीं रौशन गलियां
और जल पड़े थे दिल लोगों के
अब मैं तो नहीं हूँ वहां पर
कभी कभी इक टीस सी उठ आती है
और याद आता उस फूलवाली का चेहरा
जो बैठा करती थी उसी किनारे
हर शक्ल में इक शक्ल को ढूंढ़ना
अब तो ऐसी आदत सी बन गयी है
हर आती जाती चीज़ को सहम के देखना
और सोचना कोई छिपा तो नहीं बैठा उस पेड़ के किनारे
दुःख तो बहुत होता है
और मन भी बहुत करता है कुछ कर गुजरने को
पर परिस्थितियों के शिकंजे में बेबस सा पाता हूँ खुद को
और फिर एक बार मजबूर हो जाता हूँ सोचने को
कांच के टुकडो की तरह बिखर जाती है जिंदगी
अपने काम को जाते लोग पलट जाते हैं
जाने वो लोग कौन हैं जो ऐसा करने निकल आते हैं
मेरे गांव में भी हुआ था धमाका
जहाँ मेरा घर था उस सड़क के किनारे
सूख गयी थीं रौशन गलियां
और जल पड़े थे दिल लोगों के
अब मैं तो नहीं हूँ वहां पर
कभी कभी इक टीस सी उठ आती है
और याद आता उस फूलवाली का चेहरा
जो बैठा करती थी उसी किनारे
हर शक्ल में इक शक्ल को ढूंढ़ना
अब तो ऐसी आदत सी बन गयी है
हर आती जाती चीज़ को सहम के देखना
और सोचना कोई छिपा तो नहीं बैठा उस पेड़ के किनारे
दुःख तो बहुत होता है
और मन भी बहुत करता है कुछ कर गुजरने को
पर परिस्थितियों के शिकंजे में बेबस सा पाता हूँ खुद को
और फिर एक बार मजबूर हो जाता हूँ सोचने को
Wednesday, December 17, 2008
चौराहे
चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर रास्ते चार हैं
कौन से रास्ते पर है चलना
ये तो आप ही के संस्कार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर मिलने वाले लोगों की भरमार है
किन लोगों से करनी है दोस्ती
इतने तो आप ही समझदार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर उत्पादों के प्रचार हैं
किन उत्पादों को आपको है खरीदना
ये तो आप ही के विचार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर लूट और अत्याचार हैं
इन सब से आपको हैं बचना
वरना कल आपके भी समाचार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर रास्ते चार हैं
कौन से रास्ते पर है चलना
ये तो आप ही के संस्कार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर मिलने वाले लोगों की भरमार है
किन लोगों से करनी है दोस्ती
इतने तो आप ही समझदार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर उत्पादों के प्रचार हैं
किन उत्पादों को आपको है खरीदना
ये तो आप ही के विचार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर लूट और अत्याचार हैं
इन सब से आपको हैं बचना
वरना कल आपके भी समाचार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
Monday, December 8, 2008
कौन हैं ये ?
होते कौन हैं ये हमें डराने वाले ?
होते कौन हैं ये हमें धमकाने वाले ?
कौन हैं जो ललकार रहे हैं हमारी अखंडता को ?
कौन हैं जो पुकार रहे हैं हमारी क्षमता को ?
क्या ये जानते नहीं हैं कि ?
हम चीर सकते हैं दुश्मन का कलेजा हमारी तीसरी आँख से
हम छीन सकते हैं इनका जीवन हमारे खडग के वार मात्र से
या ये वाकिफ ही नहीं हैं हमारी एकता की मज़बूत नीवों से
और वाकिफ नहीं हैं हमारी ताकत की सख्त ईटों से
तो आओ दिखा दे इन्हें कि कितना शोर है हमारे शास्त्रों के आगाज़ में
और गाड दे मृत्यु के ध्वज इनके सरों में
सही सत्य है क्योंकि ये ही स्तिथि है
तिरंगे का अपमान करने पर निश्चित ही ये नियति है
होते कौन हैं ये हमें धमकाने वाले ?
कौन हैं जो ललकार रहे हैं हमारी अखंडता को ?
कौन हैं जो पुकार रहे हैं हमारी क्षमता को ?
क्या ये जानते नहीं हैं कि ?
हम चीर सकते हैं दुश्मन का कलेजा हमारी तीसरी आँख से
हम छीन सकते हैं इनका जीवन हमारे खडग के वार मात्र से
या ये वाकिफ ही नहीं हैं हमारी एकता की मज़बूत नीवों से
और वाकिफ नहीं हैं हमारी ताकत की सख्त ईटों से
तो आओ दिखा दे इन्हें कि कितना शोर है हमारे शास्त्रों के आगाज़ में
और गाड दे मृत्यु के ध्वज इनके सरों में
सही सत्य है क्योंकि ये ही स्तिथि है
तिरंगे का अपमान करने पर निश्चित ही ये नियति है
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