Saturday, January 24, 2009

मकान

अधूरा बना मकान
ईंट रेत पत्थरों से मिलकर
सुंदर पौधों की छोटी क्यारिओं से घिर कर
अपने बगीचे को एक - टक निहारता
अधूरा खड़ा मकान

अपने आँगन में नन्हे पैरों के निशानों से सज कर
अपनी दीवारों को पेंसिल के चित्रों से भर कर
बचपन के कोमल हाथों को थामे
आसमान से बड़ा मकान
अधूरा खड़ा मकान

अपने दरवाजों पर राखी के धागों से बंध कर
अपनी डोलियों पर दिवाली के दीयों को रख कर
किसी की भावनाओं से अंत तक जुडा मकान
अधूरा खड़ा मकान

अपने चौखट पर रंगीन माडनों को सहेज कर
अपनी दीवारों में लज़ीज़ पकवानों की खुशबु को समेट कर
हर त्यौहार के लिए बेसब्री से
इंतज़ार में खड़ा मकान
अधूरा बना मकान

Tuesday, January 20, 2009

आत्महत्या

क्यों किसी को कहना पड़ता है?
बस रास्ता अब मौत है
क्यों किसी को सहना पड़ता है?
जिस का जिंदगी को भी खौफ है
कि बिच्छुओं के डंक सी चुभती होगी जिन्दगी
या फडफडाती होगी उलझी हुई पतंग सी जिंदगी
और सोचती होगी कि ये किसके मोहपाश में फंसी हूँ मैं
ऐसा कौनसा छोर है जिसके लिए बची हूँ मैं
फ़िर गिर जाती होगी ये ही कहते हुए
कि छोड़ दो ये मुट्ठीयां और जाने दो मुझे
इतना सताया तो मैंने तुम्हे
क्यों बैठे हो अब भी मुझे पकड़े हुए
तो क्या ऐसी ही विडम्बना कि देहरी पर बैठे
वो अपना जन्म घुट - घुट के जिया करता है?
इसलिए तो शायद कोई...
इसलिए तो शायद कोई आत्महत्या किया करता है