ऐसी भी क्या दुविधा है
क्यों इतनी असुविधा है
मेरे प्रेम के गीतों में
बोल वोही हैं, भाव वही है
मेरे मन के चिन्हों में
रूप वोही, आवाज़ वही है
कैसी निर्मल वाणी है तेरी
फिर मीठे शब्दों की आई क्यों दुर्लभता है
ऐसी भी क्या दुविधा है..
उस ने क्या देखा था हम में
वन-सघन दिए पंथ मिलाये
फिर कच्चे रस्ते पर जब चलते
उडी धुल, और मिटटी आंधी
तो गीली मुट्ठी हो जाने तक
तुने हाथ पकड़ कर साथ निभाए
अपने पैरो की ठोकर से बचते
लोग वोही हैं, हाथ वोही हैं
लगता है कि साथ है कोई
फिर वन-भर में फैली क्यों निर्जनता है
ऐसी भी क्या दुविधा है..
दूर शहर है, ठौर बहुत हैं
पग पग धुप जलेगी, प्यास लगेगी
बन के दाना, बन के जल
जीवन पर्वत तर जायेंगे
अपने प्राणों में पंखो के लगने तक
सदैव साथ निभायेंगे
मेरे हृदये की गुंजो में रहते
शब्द वोही हैं, आभास वोही है
इस सृष्टि से माँगा था ये सब हम ने
फिर तेरे वादों में आई ऐसी क्यों दुबर्लता है
ऐसी भी क्या दुविधा है..