सर उठा फिर जमीं से
बदलने युद्ध के परिणाम को
सांस भर ले फिर ह्रदय में
थामने स्वयं के अभिमान को
हारता तो हर कोई है
समय के भर प्रहार से
घुटनों पर जा गिरता है
चेतन के चीत्कार से
समेट अपनी शक्ति सारी
फिर झोक दे बदन में
बची जो लाल बूंदें हैं
फिर छोड़ दे गमन में
टकरायेंगे तुझ से फिर
थपेड़े तूफानी पवन के
बहेगा माथे फिर लहू
गहरे दर्द और जलन से
पर तलवार ना भारी है
तेरी हार के वजन से
उर्जा तेरी कण कण जुटेगी
कर जीत के मनन से
तेज़ चेहरे का प्रखर होगा
लहू और मिटटी के सृजन से
शत्रु तेरा डरने लगेगा
तेरे कदमो की घनन से
कर दे अब अंतिम प्रहार
जो हंस रहा था तुझ पे
सिमित तेरा सामर्थ्य समझ
खुश हो रहा था विजय में
अब जा समां सकता है तू
मृत्यु के जलाशय में
अमरता है तेरी क्योंकि
हार नहीं ऐसी पराजय में