इक धमाके से कैसे बदल जाती है जिंदगी
कांच के टुकडो की तरह बिखर जाती है जिंदगी
अपने काम को जाते लोग पलट जाते हैं
जाने वो लोग कौन हैं जो ऐसा करने निकल आते हैं
मेरे गांव में भी हुआ था धमाका
जहाँ मेरा घर था उस सड़क के किनारे
सूख गयी थीं रौशन गलियां
और जल पड़े थे दिल लोगों के
अब मैं तो नहीं हूँ वहां पर
कभी कभी इक टीस सी उठ आती है
और याद आता उस फूलवाली का चेहरा
जो बैठा करती थी उसी किनारे
हर शक्ल में इक शक्ल को ढूंढ़ना
अब तो ऐसी आदत सी बन गयी है
हर आती जाती चीज़ को सहम के देखना
और सोचना कोई छिपा तो नहीं बैठा उस पेड़ के किनारे
दुःख तो बहुत होता है
और मन भी बहुत करता है कुछ कर गुजरने को
पर परिस्थितियों के शिकंजे में बेबस सा पाता हूँ खुद को
और फिर एक बार मजबूर हो जाता हूँ सोचने को
Friday, December 19, 2008
Wednesday, December 17, 2008
चौराहे
चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर रास्ते चार हैं
कौन से रास्ते पर है चलना
ये तो आप ही के संस्कार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर मिलने वाले लोगों की भरमार है
किन लोगों से करनी है दोस्ती
इतने तो आप ही समझदार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर उत्पादों के प्रचार हैं
किन उत्पादों को आपको है खरीदना
ये तो आप ही के विचार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर लूट और अत्याचार हैं
इन सब से आपको हैं बचना
वरना कल आपके भी समाचार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर रास्ते चार हैं
कौन से रास्ते पर है चलना
ये तो आप ही के संस्कार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर मिलने वाले लोगों की भरमार है
किन लोगों से करनी है दोस्ती
इतने तो आप ही समझदार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर उत्पादों के प्रचार हैं
किन उत्पादों को आपको है खरीदना
ये तो आप ही के विचार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
और हर चौराहे पर लूट और अत्याचार हैं
इन सब से आपको हैं बचना
वरना कल आपके भी समाचार हैं
पर चौराहे हज़ार हैं
Monday, December 8, 2008
कौन हैं ये ?
होते कौन हैं ये हमें डराने वाले ?
होते कौन हैं ये हमें धमकाने वाले ?
कौन हैं जो ललकार रहे हैं हमारी अखंडता को ?
कौन हैं जो पुकार रहे हैं हमारी क्षमता को ?
क्या ये जानते नहीं हैं कि ?
हम चीर सकते हैं दुश्मन का कलेजा हमारी तीसरी आँख से
हम छीन सकते हैं इनका जीवन हमारे खडग के वार मात्र से
या ये वाकिफ ही नहीं हैं हमारी एकता की मज़बूत नीवों से
और वाकिफ नहीं हैं हमारी ताकत की सख्त ईटों से
तो आओ दिखा दे इन्हें कि कितना शोर है हमारे शास्त्रों के आगाज़ में
और गाड दे मृत्यु के ध्वज इनके सरों में
सही सत्य है क्योंकि ये ही स्तिथि है
तिरंगे का अपमान करने पर निश्चित ही ये नियति है
होते कौन हैं ये हमें धमकाने वाले ?
कौन हैं जो ललकार रहे हैं हमारी अखंडता को ?
कौन हैं जो पुकार रहे हैं हमारी क्षमता को ?
क्या ये जानते नहीं हैं कि ?
हम चीर सकते हैं दुश्मन का कलेजा हमारी तीसरी आँख से
हम छीन सकते हैं इनका जीवन हमारे खडग के वार मात्र से
या ये वाकिफ ही नहीं हैं हमारी एकता की मज़बूत नीवों से
और वाकिफ नहीं हैं हमारी ताकत की सख्त ईटों से
तो आओ दिखा दे इन्हें कि कितना शोर है हमारे शास्त्रों के आगाज़ में
और गाड दे मृत्यु के ध्वज इनके सरों में
सही सत्य है क्योंकि ये ही स्तिथि है
तिरंगे का अपमान करने पर निश्चित ही ये नियति है
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