Sunday, October 23, 2011

सफ़र

हँसते हँसते, निकला मैं घर से
चाबी घुमाते उठाई नज़र

वो मेरे सामने गुमसुम खड़ी थी
और मैं वहीँ गया ठहर

देख के उसको, मुंह मेरा खुल गया
साडी हंसी गुम गयी किधर

बाकी सब चीज़े, धुंधला गयी थीं
कुछ नहीं आ रहा था नज़र

आँखों में उसकी, सागर बसे थे
कितने मोती गए थे बिखर

जुल्फे थीं या थे, काले वो बादल
फैले थे चेहरे पे इधर उधर

कुछ कहने की मैंने, कोशिश भी की थी
पर मेरी सांसे जम गयी मगर

अब वो कुछ बोलेगी, सोच के दिल मेरा
उड़ने लगा था लहर लहर 

भैया मम्मी, घर में हैं क्या
थोड़ी देर पहले आयी थी इधर

सुन के दिल मेरा, छन से टूटा
सपनो का महल हो गया खंडहर

मुह को झुका के, वहां से निकला
अगले पल हो गया रफू चक्कर

सोचा था क्या मैंने और क्या हो गया 
ऐसा ही होता है जिंदगी का सफ़र

Thursday, March 31, 2011

अंतिम प्रहार

सर उठा फिर जमीं से
बदलने युद्ध के परिणाम को
सांस भर ले फिर ह्रदय में
थामने स्वयं के अभिमान को
हारता तो हर कोई है
समय के भर प्रहार से
घुटनों पर जा गिरता है
चेतन के चीत्कार से

समेट अपनी शक्ति सारी
फिर झोक दे बदन में
बची जो लाल बूंदें हैं
फिर छोड़ दे गमन में
टकरायेंगे तुझ से फिर
थपेड़े तूफानी पवन के
बहेगा माथे फिर लहू
गहरे दर्द और जलन से

पर तलवार ना भारी है
तेरी हार के वजन से
उर्जा तेरी कण कण जुटेगी
कर जीत के मनन से
तेज़ चेहरे का प्रखर होगा
लहू और मिटटी के सृजन से
शत्रु तेरा डरने लगेगा
तेरे कदमो की घनन से

कर दे अब अंतिम प्रहार
जो हंस रहा था तुझ पे
सिमित तेरा सामर्थ्य समझ
खुश हो रहा था विजय में
अब जा समां सकता है तू
मृत्यु के जलाशय में
अमरता है तेरी क्योंकि
हार नहीं ऐसी पराजय में