हँसते हँसते, निकला मैं घर से
चाबी घुमाते उठाई नज़र
वो मेरे सामने गुमसुम खड़ी थी
और मैं वहीँ गया ठहर
देख के उसको, मुंह मेरा खुल गया
साडी हंसी गुम गयी किधर
बाकी सब चीज़े, धुंधला गयी थीं
कुछ नहीं आ रहा था नज़र
आँखों में उसकी, सागर बसे थे
कितने मोती गए थे बिखर
जुल्फे थीं या थे, काले वो बादल
फैले थे चेहरे पे इधर उधर
कुछ कहने की मैंने, कोशिश भी की थी
पर मेरी सांसे जम गयी मगर
अब वो कुछ बोलेगी, सोच के दिल मेरा
उड़ने लगा था लहर लहर
भैया मम्मी, घर में हैं क्या
थोड़ी देर पहले आयी थी इधर
सुन के दिल मेरा, छन से टूटा
सपनो का महल हो गया खंडहर
मुह को झुका के, वहां से निकला
अगले पल हो गया रफू चक्कर
सोचा था क्या मैंने और क्या हो गया
ऐसा ही होता है जिंदगी का सफ़र