Monday, November 1, 2010

सामान

खुली किताबें, मेरा कंप्यूटर
और मेरे कमरे में बिखरा सामान
कहता रहता है हमे जमा दे
क्या बैठा रहता है मोटे सांड

दिन सात हुए हैं, कहते बेहाल हुए हैं
एक आँख निहारे देखा भी मैंने
पर आलस ऐसे जकड़ा था
की जू तक न रेंगी मेरे कान

बंद सूटकेस और गंदे कपडे
भरे फर्श और सिमटे गद्दे
भूत बनकर मुझे डरता
कमरे भर में फैला शैतान

हर कोने में डब्बों के पेड़ खड़े हैं
पलंग के नीचे मिटटी के ढेर लगे हैं
कहते रहते हैं हमे हटा दे
क्या सोता रहता है मोटे सांड