चिता ही कह देती है कौन जला है
उठती हुई लपटे पुण्य है उसका
बची हुई राख किए पाप
निकलती गर्मी दबी इच्छाएं हैं मन की
अधजली हड्डियाँ बचे काम
चिता ही कह देती है कौन जला है
लगी लकडियाँ लिया गया क़र्ज़
ढोला गया घी दिया उधार
चढाये गए फूल समाज हैं उसका
उडाये कफ़न उसके लिए प्यार
चिता ही कह देती है कौन जला है
चमकती चिंगारियां गुस्सा हैं उसका
उड़ता धुआं मन का गुबार
चटकते कोयले टूटते सपने हैं उसके
फैलती रौशनी उसका अंहकार
चिता ही कह देती है कौन जला है
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