Tuesday, September 11, 2012

बातों का मतलब

दिल की सिलवटो को जब गिनने बैठोगे
तब समझोगे कि मेरी बातों का मतलब क्या है 

हाथों में जब अपनी शक्ल लेकर बैठोगे 
तब समझोगे कि मेरी बातों का मतलब क्या है 

अब तो बस शाम ही बाकी है 
जो कभी कुछ गुस्से में कह जाती है 
तुम जब धुप का मिजाज़ चख कर देखोगे 
तब समझोगे कि मेरी बातों का मतलब क्या है 

कल सर्दी की बहार फिर आयी थी 
साथ कुछ सुखी पत्तियां लेकर 
उस के रंगों को जब पकड़कर देखोगे 
तब समझोगे कि मेरी बातों का मतलब क्या है 

शहर की सडको ने भी अब 
किनारे डेरे लगाना बंद कर दिया है 
अकेले जब भी वहां से गुजरोगे
तब समझोगे कि मेरी बातों का मतलब क्या है 

Sunday, October 23, 2011

सफ़र

हँसते हँसते, निकला मैं घर से
चाबी घुमाते उठाई नज़र

वो मेरे सामने गुमसुम खड़ी थी
और मैं वहीँ गया ठहर

देख के उसको, मुंह मेरा खुल गया
साडी हंसी गुम गयी किधर

बाकी सब चीज़े, धुंधला गयी थीं
कुछ नहीं आ रहा था नज़र

आँखों में उसकी, सागर बसे थे
कितने मोती गए थे बिखर

जुल्फे थीं या थे, काले वो बादल
फैले थे चेहरे पे इधर उधर

कुछ कहने की मैंने, कोशिश भी की थी
पर मेरी सांसे जम गयी मगर

अब वो कुछ बोलेगी, सोच के दिल मेरा
उड़ने लगा था लहर लहर 

भैया मम्मी, घर में हैं क्या
थोड़ी देर पहले आयी थी इधर

सुन के दिल मेरा, छन से टूटा
सपनो का महल हो गया खंडहर

मुह को झुका के, वहां से निकला
अगले पल हो गया रफू चक्कर

सोचा था क्या मैंने और क्या हो गया 
ऐसा ही होता है जिंदगी का सफ़र

Thursday, March 31, 2011

अंतिम प्रहार

सर उठा फिर जमीं से
बदलने युद्ध के परिणाम को
सांस भर ले फिर ह्रदय में
थामने स्वयं के अभिमान को
हारता तो हर कोई है
समय के भर प्रहार से
घुटनों पर जा गिरता है
चेतन के चीत्कार से

समेट अपनी शक्ति सारी
फिर झोक दे बदन में
बची जो लाल बूंदें हैं
फिर छोड़ दे गमन में
टकरायेंगे तुझ से फिर
थपेड़े तूफानी पवन के
बहेगा माथे फिर लहू
गहरे दर्द और जलन से

पर तलवार ना भारी है
तेरी हार के वजन से
उर्जा तेरी कण कण जुटेगी
कर जीत के मनन से
तेज़ चेहरे का प्रखर होगा
लहू और मिटटी के सृजन से
शत्रु तेरा डरने लगेगा
तेरे कदमो की घनन से

कर दे अब अंतिम प्रहार
जो हंस रहा था तुझ पे
सिमित तेरा सामर्थ्य समझ
खुश हो रहा था विजय में
अब जा समां सकता है तू
मृत्यु के जलाशय में
अमरता है तेरी क्योंकि
हार नहीं ऐसी पराजय में

Wednesday, December 29, 2010

कुत्तों की बहस

इक बार कुत्तों में छिड़ी बहस देखो
की कौन कितना बलवान है
कौन सबसे बड़ा पहलवान है
कौन जोर जोर से गुर्राता है
कौन गली गली भुकियाता है

इतना होना काफी था उन को उकसाने के लिए
सब के सब बेताब हुए अपना जौहर दिखलाने के लिए
तब क्या था, हर कुत्ता अपना गला फाड़ने लगा
इक दुसरे को देख हर कोई जोर जोर से दहाड़ने लगा

पर उन में इक पिल्ला था भोला भला
थोडा छोटा था और था आधा काला
उस को न समझा ये खेल निराला
और बेकार लगा व्यर्थ उर्जा गंवाना

बेचारा मुहं झुका के वहां से निकला
और इक अच्छे से कोने में जा बैठा
पहले तो अंगड़ाई ले खुजलाया अपना सर
फिर शुरू किया पूछ से बतियाना

वहीं शर्मा जी दुसरे माले पे अलसाए पड़े थे
दोपहर के खाने के बाद सुस्ताये पड़े थे
मगर अब कुत्तों की जंग का शोर तेज़ होने लगा था
और शर्मा की नींद में खलल पड़ने लगा था

जब टूटी नींद तो शर्मा को आया गुस्सा आया
खिड़की खोली और चौकीदार पे झल्लाया
की ये क्या नाटक लगा रखा है
दोपहर की नींद को भी आफत बना रखा है

सुन चौकीदार ने उठाया अपना डंडा
और मचा दिया कुत्तों के झुण्ड में दंगा
सब के पिछवाड़े पे जो उस ने डंडे बरसाए
दुम दबा के भाग कुत्तों ने अपने प्राण बचाए

वो पिल्ला अभी भी बैठा सब देख रहा था
और अपनी सांस दबाये ये सोच रहा था
की जो फ़ालतू के पचड़ो में अपनी टांग अडाता है
कुछ नहीं मिलता उसे और डंडे पिछवाड़े पे खाता है

Monday, November 1, 2010

सामान

खुली किताबें, मेरा कंप्यूटर
और मेरे कमरे में बिखरा सामान
कहता रहता है हमे जमा दे
क्या बैठा रहता है मोटे सांड

दिन सात हुए हैं, कहते बेहाल हुए हैं
एक आँख निहारे देखा भी मैंने
पर आलस ऐसे जकड़ा था
की जू तक न रेंगी मेरे कान

बंद सूटकेस और गंदे कपडे
भरे फर्श और सिमटे गद्दे
भूत बनकर मुझे डरता
कमरे भर में फैला शैतान

हर कोने में डब्बों के पेड़ खड़े हैं
पलंग के नीचे मिटटी के ढेर लगे हैं
कहते रहते हैं हमे हटा दे
क्या सोता रहता है मोटे सांड

Thursday, October 21, 2010

दुविधा

ऐसी भी क्या दुविधा है
क्यों इतनी असुविधा है
मेरे प्रेम के गीतों में
बोल वोही हैं, भाव वही है
मेरे मन के चिन्हों में
रूप वोही, आवाज़ वही है
कैसी निर्मल वाणी है तेरी
फिर मीठे शब्दों की आई क्यों दुर्लभता है

ऐसी भी क्या दुविधा है..

उस ने क्या देखा था हम में
वन-सघन दिए पंथ मिलाये
फिर कच्चे रस्ते पर जब चलते
उडी धुल, और मिटटी आंधी
तो गीली मुट्ठी हो जाने तक
तुने हाथ पकड़ कर साथ निभाए
अपने पैरो की ठोकर से बचते
लोग वोही हैं, हाथ वोही हैं
लगता है कि साथ है कोई
फिर वन-भर में फैली क्यों निर्जनता है

ऐसी भी क्या दुविधा है..

दूर शहर है, ठौर बहुत हैं
पग पग धुप जलेगी, प्यास लगेगी
बन के दाना, बन के जल
जीवन पर्वत तर जायेंगे
अपने प्राणों में पंखो के लगने तक
सदैव साथ निभायेंगे
मेरे हृदये की गुंजो में रहते
शब्द वोही हैं, आभास वोही है
इस सृष्टि से माँगा था ये सब हम ने
फिर तेरे वादों में आई ऐसी क्यों दुबर्लता है

ऐसी भी क्या दुविधा है..

Saturday, December 5, 2009

अमरुद का पेड़

अमरुद तो बहुत खाए उसके
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
छांव में घर तो बहुत बनाये उसकी
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

सहारे छोटी टहनियों के छोर चढ़ जाना
भरी मुट्ठी पत्थरों की और अमरुद नीचे गिराना
निशाने तो बहुत लगाये उस पर
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

उठा खुरपी नाम के अक्षर तने पे गोद देना
कहाँ छुपाऊ खिलौने सोचते जड़े खोद देना
भर बचपन तो बहुत सताए उसको
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

भरी दोपहर गर्मी की और चबूतरे पर सुस्ताना
हुई सर्द शाम कि सूखी पत्तियों में आग लगाना
मौसम तो अगिनत दिखाए उसको
पर बात नही कि कभी उस पेड़ से मैंने

Monday, August 3, 2009

हो रही है

आपकी दोस्ती की कश्ती में सवार
खुशी की हर लहर से
पहचान हो रही है
सूरज की रंगीन किरणों से भर भर
देखो शाम हो रही है

किनारे की डाली पे बैठा पंछी
शायद हंस रहा है
उसके मन की कोई हलचल
जवान हो रही है

मेरी कश्ती में बैठा पानी
कहता रहता है
उसको पता है कैसी बातें
दरमियान हो रही है
सूरज की रंगीन किरणों से भर भर
देखो शाम हो रही है

Thursday, July 30, 2009

एक पेड़

जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने पक्षी उड़ जाते हैं
घर कितने ढह जाते हैं
फ़िर कुछ दीवाने आरी लेकर
नीचे फैला गात गठीला
टुकड़े टुकड़े कर जाते हैं

जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने पत्ते मुरझाते हैं
फल कितने सड़ जाते हैं
और बिखरी बैठी मिटटी माँ के
पालन पोषण करते दिल
उखड़े उखड़े रह जाते हैं

जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने साये गुम जाते हैं
चक्षु कितने भर आते हैं
उस झुरमुट के बाकी साथी
अपने सख की पीड़ा तक
रोते रोते रह जाते हैं

जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है

Wednesday, July 22, 2009

मेरी इच्छा

ऐ काश मेरे दो पंख होते
उड़ता रहता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं

चिडियों के घर को जा के सजाता
तिनको को बुन के खिलौने बनाता
करता रहता सृजन मैं

तितली के सारे फूलों से मिलता
रंगों से अपनी जेबों को भरता
खोया रहता सुगंध में

बादल के आँगन में बारिश उगाता
सागर का रस्ता हवा को दिखाता
खेला करता पवन में

तारों की झिलमिल में रातें बिताता
परियों को धरती के गाने सुनाता
गाता रहता भुवन में

ऐ काश मेरे दो पंख होते
उड़ता बनाता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं