अमरुद तो बहुत खाए उसके
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
छांव में घर तो बहुत बनाये उसकी
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
सहारे छोटी टहनियों के छोर चढ़ जाना
भरी मुट्ठी पत्थरों की और अमरुद नीचे गिराना
निशाने तो बहुत लगाये उस पर
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
उठा खुरपी नाम के अक्षर तने पे गोद देना
कहाँ छुपाऊ खिलौने सोचते जड़े खोद देना
भर बचपन तो बहुत सताए उसको
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
भरी दोपहर गर्मी की और चबूतरे पर सुस्ताना
हुई सर्द शाम कि सूखी पत्तियों में आग लगाना
मौसम तो अगिनत दिखाए उसको
पर बात नही कि कभी उस पेड़ से मैंने