जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने पक्षी उड़ जाते हैं
घर कितने ढह जाते हैं
फ़िर कुछ दीवाने आरी लेकर
नीचे फैला गात गठीला
टुकड़े टुकड़े कर जाते हैं
जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने पत्ते मुरझाते हैं
फल कितने सड़ जाते हैं
और बिखरी बैठी मिटटी माँ के
पालन पोषण करते दिल
उखड़े उखड़े रह जाते हैं
जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने साये गुम जाते हैं
चक्षु कितने भर आते हैं
उस झुरमुट के बाकी साथी
अपने सख की पीड़ा तक
रोते रोते रह जाते हैं
जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
Thursday, July 30, 2009
Wednesday, July 22, 2009
मेरी इच्छा
ऐ काश मेरे दो पंख होते
उड़ता रहता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं
चिडियों के घर को जा के सजाता
तिनको को बुन के खिलौने बनाता
करता रहता सृजन मैं
तितली के सारे फूलों से मिलता
रंगों से अपनी जेबों को भरता
खोया रहता सुगंध में
बादल के आँगन में बारिश उगाता
सागर का रस्ता हवा को दिखाता
खेला करता पवन में
तारों की झिलमिल में रातें बिताता
परियों को धरती के गाने सुनाता
गाता रहता भुवन में
ऐ काश मेरे दो पंख होते
उड़ता बनाता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं
उड़ता रहता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं
चिडियों के घर को जा के सजाता
तिनको को बुन के खिलौने बनाता
करता रहता सृजन मैं
तितली के सारे फूलों से मिलता
रंगों से अपनी जेबों को भरता
खोया रहता सुगंध में
बादल के आँगन में बारिश उगाता
सागर का रस्ता हवा को दिखाता
खेला करता पवन में
तारों की झिलमिल में रातें बिताता
परियों को धरती के गाने सुनाता
गाता रहता भुवन में
ऐ काश मेरे दो पंख होते
उड़ता बनाता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं
Thursday, July 16, 2009
शाम की सैर
एक शाम सैर को निकले
गलियां सुनसान थीं कूचे सुनसान थे
रास्ते तो ऐसे खाली पड़े थे
जैसे आने वाले कोई तूफान थे
थोड़ा आगे चले तो समझ पड़ा कि
मंत्री जी के रूप में आए शहर के मेहमान थे
वो तो कुर्सी मचकाए आधी नींद में पड़े थे
और लाऊड स्पीकर में हो रहे उनके गुणगान थे
कहीं खलल उनकी नींद में ना हो जाए
इसलिए घेरे उनको खड़े कई पहलवान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
मन्दिर के बाहर हो रहे कुछ विधान थे
बीच में आग जल रही थी और
चारों तरफ़ पंडित लोग विराजमान थे
जाप तो वो मंत्रों का कर रहे थे पर
आने वाले चढावों पर उनके ज्यादा ध्यान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
कच्ची बस्ती में कुछ टूटे फूटे मकान थे
बाहर बच्चे नंगे भीख मांग रहे थे पर
हर घर में टीवी फ्रीज जैसे सामान थे
मासूम बेचारे हाथ फैलाये खड़े थे
और गालों पे उनके आसूँओ के निशान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा की
शहर के बाहर खेत और खलियान थे
औरतें कुँए पर पानी भर रही थीं
और अपने हल को ले के जुटे कुछ किसान थे
उनकी मेहनत से खेत ऐसे लहलहा रहे थे
जैसे कृष्ण की रासलीला के लिए बने ये ही उद्यान थे
थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
सड़क के एक तरफ़ जंगल और एक तरफ़ शमशान थे
चलते चलते ठोकर लगी एक हड्डी से
तो हड्डी के ऐसे कुछ बयान थे
कि संभल के चलो ए इंसान
हम भी कभी इंसान थे
गलियां सुनसान थीं कूचे सुनसान थे
रास्ते तो ऐसे खाली पड़े थे
जैसे आने वाले कोई तूफान थे
थोड़ा आगे चले तो समझ पड़ा कि
मंत्री जी के रूप में आए शहर के मेहमान थे
वो तो कुर्सी मचकाए आधी नींद में पड़े थे
और लाऊड स्पीकर में हो रहे उनके गुणगान थे
कहीं खलल उनकी नींद में ना हो जाए
इसलिए घेरे उनको खड़े कई पहलवान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
मन्दिर के बाहर हो रहे कुछ विधान थे
बीच में आग जल रही थी और
चारों तरफ़ पंडित लोग विराजमान थे
जाप तो वो मंत्रों का कर रहे थे पर
आने वाले चढावों पर उनके ज्यादा ध्यान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
कच्ची बस्ती में कुछ टूटे फूटे मकान थे
बाहर बच्चे नंगे भीख मांग रहे थे पर
हर घर में टीवी फ्रीज जैसे सामान थे
मासूम बेचारे हाथ फैलाये खड़े थे
और गालों पे उनके आसूँओ के निशान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा की
शहर के बाहर खेत और खलियान थे
औरतें कुँए पर पानी भर रही थीं
और अपने हल को ले के जुटे कुछ किसान थे
उनकी मेहनत से खेत ऐसे लहलहा रहे थे
जैसे कृष्ण की रासलीला के लिए बने ये ही उद्यान थे
थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
सड़क के एक तरफ़ जंगल और एक तरफ़ शमशान थे
चलते चलते ठोकर लगी एक हड्डी से
तो हड्डी के ऐसे कुछ बयान थे
कि संभल के चलो ए इंसान
हम भी कभी इंसान थे
Friday, July 10, 2009
कौन जला है
चिता ही कह देती है कौन जला है
उठती हुई लपटे पुण्य है उसका
बची हुई राख किए पाप
निकलती गर्मी दबी इच्छाएं हैं मन की
अधजली हड्डियाँ बचे काम
चिता ही कह देती है कौन जला है
लगी लकडियाँ लिया गया क़र्ज़
ढोला गया घी दिया उधार
चढाये गए फूल समाज हैं उसका
उडाये कफ़न उसके लिए प्यार
चिता ही कह देती है कौन जला है
चमकती चिंगारियां गुस्सा हैं उसका
उड़ता धुआं मन का गुबार
चटकते कोयले टूटते सपने हैं उसके
फैलती रौशनी उसका अंहकार
चिता ही कह देती है कौन जला है
उठती हुई लपटे पुण्य है उसका
बची हुई राख किए पाप
निकलती गर्मी दबी इच्छाएं हैं मन की
अधजली हड्डियाँ बचे काम
चिता ही कह देती है कौन जला है
लगी लकडियाँ लिया गया क़र्ज़
ढोला गया घी दिया उधार
चढाये गए फूल समाज हैं उसका
उडाये कफ़न उसके लिए प्यार
चिता ही कह देती है कौन जला है
चमकती चिंगारियां गुस्सा हैं उसका
उड़ता धुआं मन का गुबार
चटकते कोयले टूटते सपने हैं उसके
फैलती रौशनी उसका अंहकार
चिता ही कह देती है कौन जला है
Wednesday, July 8, 2009
दे दो
मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो
रोक नही पा रहा हूँ आकाल से त्रस्त उन्माद को हृदय में
मुझे अपने स्पर्श से उत्पतित थोडी नमी दे दो
कही तुमने अपने करों के द्वार फैलाये तो होंगे
भीतर आने को व्याकुल मुझे आतुर रौशनी दे दो
संघर्षों के फेर में भटके अपरिचित घोषित हो चुका हूँ
अब तो आगंतुक दृष्टि में विचरित चांदनी दे दो
सिमित नही होता है किसी की आशाओं का पोखर
भर सकूं जहाँ उज्जवल निधि वहीं दे दो
मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो
रोक नही पा रहा हूँ आकाल से त्रस्त उन्माद को हृदय में
मुझे अपने स्पर्श से उत्पतित थोडी नमी दे दो
कही तुमने अपने करों के द्वार फैलाये तो होंगे
भीतर आने को व्याकुल मुझे आतुर रौशनी दे दो
संघर्षों के फेर में भटके अपरिचित घोषित हो चुका हूँ
अब तो आगंतुक दृष्टि में विचरित चांदनी दे दो
सिमित नही होता है किसी की आशाओं का पोखर
भर सकूं जहाँ उज्जवल निधि वहीं दे दो
मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो
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