Saturday, December 5, 2009

अमरुद का पेड़

अमरुद तो बहुत खाए उसके
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
छांव में घर तो बहुत बनाये उसकी
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

सहारे छोटी टहनियों के छोर चढ़ जाना
भरी मुट्ठी पत्थरों की और अमरुद नीचे गिराना
निशाने तो बहुत लगाये उस पर
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

उठा खुरपी नाम के अक्षर तने पे गोद देना
कहाँ छुपाऊ खिलौने सोचते जड़े खोद देना
भर बचपन तो बहुत सताए उसको
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

भरी दोपहर गर्मी की और चबूतरे पर सुस्ताना
हुई सर्द शाम कि सूखी पत्तियों में आग लगाना
मौसम तो अगिनत दिखाए उसको
पर बात नही कि कभी उस पेड़ से मैंने

Monday, August 3, 2009

हो रही है

आपकी दोस्ती की कश्ती में सवार
खुशी की हर लहर से
पहचान हो रही है
सूरज की रंगीन किरणों से भर भर
देखो शाम हो रही है

किनारे की डाली पे बैठा पंछी
शायद हंस रहा है
उसके मन की कोई हलचल
जवान हो रही है

मेरी कश्ती में बैठा पानी
कहता रहता है
उसको पता है कैसी बातें
दरमियान हो रही है
सूरज की रंगीन किरणों से भर भर
देखो शाम हो रही है

Thursday, July 30, 2009

एक पेड़

जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने पक्षी उड़ जाते हैं
घर कितने ढह जाते हैं
फ़िर कुछ दीवाने आरी लेकर
नीचे फैला गात गठीला
टुकड़े टुकड़े कर जाते हैं

जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने पत्ते मुरझाते हैं
फल कितने सड़ जाते हैं
और बिखरी बैठी मिटटी माँ के
पालन पोषण करते दिल
उखड़े उखड़े रह जाते हैं

जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने साये गुम जाते हैं
चक्षु कितने भर आते हैं
उस झुरमुट के बाकी साथी
अपने सख की पीड़ा तक
रोते रोते रह जाते हैं

जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है

Wednesday, July 22, 2009

मेरी इच्छा

ऐ काश मेरे दो पंख होते
उड़ता रहता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं

चिडियों के घर को जा के सजाता
तिनको को बुन के खिलौने बनाता
करता रहता सृजन मैं

तितली के सारे फूलों से मिलता
रंगों से अपनी जेबों को भरता
खोया रहता सुगंध में

बादल के आँगन में बारिश उगाता
सागर का रस्ता हवा को दिखाता
खेला करता पवन में

तारों की झिलमिल में रातें बिताता
परियों को धरती के गाने सुनाता
गाता रहता भुवन में

ऐ काश मेरे दो पंख होते
उड़ता बनाता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं

Thursday, July 16, 2009

शाम की सैर

एक शाम सैर को निकले
गलियां सुनसान थीं कूचे सुनसान थे
रास्ते तो ऐसे खाली पड़े थे
जैसे आने वाले कोई तूफान थे

थोड़ा आगे चले तो समझ पड़ा कि
मंत्री जी के रूप में आए शहर के मेहमान थे
वो तो कुर्सी मचकाए आधी नींद में पड़े थे
और लाऊड स्पीकर में हो रहे उनके गुणगान थे
कहीं खलल उनकी नींद में ना हो जाए
इसलिए घेरे उनको खड़े कई पहलवान थे

और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
मन्दिर के बाहर हो रहे कुछ विधान थे
बीच में आग जल रही थी और
चारों तरफ़ पंडित लोग विराजमान थे
जाप तो वो मंत्रों का कर रहे थे पर
आने वाले चढावों पर उनके ज्यादा ध्यान थे

और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
कच्ची बस्ती में कुछ टूटे फूटे मकान थे
बाहर बच्चे नंगे भीख मांग रहे थे पर
हर घर में टीवी फ्रीज जैसे सामान थे
मासूम बेचारे हाथ फैलाये खड़े थे
और गालों पे उनके आसूँओ के निशान थे

और थोड़ा और आगे चले तो देखा की
शहर के बाहर खेत और खलियान थे
औरतें कुँए पर पानी भर रही थीं
और अपने हल को ले के जुटे कुछ किसान थे
उनकी मेहनत से खेत ऐसे लहलहा रहे थे
जैसे कृष्ण की रासलीला के लिए बने ये ही उद्यान थे

थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
सड़क के एक तरफ़ जंगल और एक तरफ़ शमशान थे
चलते चलते ठोकर लगी एक हड्डी से
तो हड्डी के ऐसे कुछ बयान थे
कि संभल के चलो ए इंसान
हम भी कभी इंसान थे

Friday, July 10, 2009

कौन जला है

चिता ही कह देती है कौन जला है
उठती हुई लपटे पुण्य है उसका
बची हुई राख किए पाप
निकलती गर्मी दबी इच्छाएं हैं मन की
अधजली हड्डियाँ बचे काम

चिता ही कह देती है कौन जला है
लगी लकडियाँ लिया गया क़र्ज़
ढोला गया घी दिया उधार
चढाये गए फूल समाज हैं उसका
उडाये कफ़न उसके लिए प्यार

चिता ही कह देती है कौन जला है
चमकती चिंगारियां गुस्सा हैं उसका
उड़ता धुआं मन का गुबार
चटकते कोयले टूटते सपने हैं उसके
फैलती रौशनी उसका अंहकार

चिता ही कह देती है कौन जला है

Wednesday, July 8, 2009

दे दो

मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो

रोक नही पा रहा हूँ आकाल से त्रस्त उन्माद को हृदय में
मुझे अपने स्पर्श से उत्पतित थोडी नमी दे दो

कही तुमने अपने करों के द्वार फैलाये तो होंगे
भीतर आने को व्याकुल मुझे आतुर रौशनी दे दो

संघर्षों के फेर में भटके अपरिचित घोषित हो चुका हूँ
अब तो आगंतुक दृष्टि में विचरित चांदनी दे दो

सिमित नही होता है किसी की आशाओं का पोखर
भर सकूं जहाँ उज्जवल निधि वहीं दे दो

मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो

Saturday, January 24, 2009

मकान

अधूरा बना मकान
ईंट रेत पत्थरों से मिलकर
सुंदर पौधों की छोटी क्यारिओं से घिर कर
अपने बगीचे को एक - टक निहारता
अधूरा खड़ा मकान

अपने आँगन में नन्हे पैरों के निशानों से सज कर
अपनी दीवारों को पेंसिल के चित्रों से भर कर
बचपन के कोमल हाथों को थामे
आसमान से बड़ा मकान
अधूरा खड़ा मकान

अपने दरवाजों पर राखी के धागों से बंध कर
अपनी डोलियों पर दिवाली के दीयों को रख कर
किसी की भावनाओं से अंत तक जुडा मकान
अधूरा खड़ा मकान

अपने चौखट पर रंगीन माडनों को सहेज कर
अपनी दीवारों में लज़ीज़ पकवानों की खुशबु को समेट कर
हर त्यौहार के लिए बेसब्री से
इंतज़ार में खड़ा मकान
अधूरा बना मकान

Tuesday, January 20, 2009

आत्महत्या

क्यों किसी को कहना पड़ता है?
बस रास्ता अब मौत है
क्यों किसी को सहना पड़ता है?
जिस का जिंदगी को भी खौफ है
कि बिच्छुओं के डंक सी चुभती होगी जिन्दगी
या फडफडाती होगी उलझी हुई पतंग सी जिंदगी
और सोचती होगी कि ये किसके मोहपाश में फंसी हूँ मैं
ऐसा कौनसा छोर है जिसके लिए बची हूँ मैं
फ़िर गिर जाती होगी ये ही कहते हुए
कि छोड़ दो ये मुट्ठीयां और जाने दो मुझे
इतना सताया तो मैंने तुम्हे
क्यों बैठे हो अब भी मुझे पकड़े हुए
तो क्या ऐसी ही विडम्बना कि देहरी पर बैठे
वो अपना जन्म घुट - घुट के जिया करता है?
इसलिए तो शायद कोई...
इसलिए तो शायद कोई आत्महत्या किया करता है