क्यों किसी को कहना पड़ता है?
बस रास्ता अब मौत है
क्यों किसी को सहना पड़ता है?
जिस का जिंदगी को भी खौफ है
कि बिच्छुओं के डंक सी चुभती होगी जिन्दगी
या फडफडाती होगी उलझी हुई पतंग सी जिंदगी
और सोचती होगी कि ये किसके मोहपाश में फंसी हूँ मैं
ऐसा कौनसा छोर है जिसके लिए बची हूँ मैं
फ़िर गिर जाती होगी ये ही कहते हुए
कि छोड़ दो ये मुट्ठीयां और जाने दो मुझे
इतना सताया तो मैंने तुम्हे
क्यों बैठे हो अब भी मुझे पकड़े हुए
तो क्या ऐसी ही विडम्बना कि देहरी पर बैठे
वो अपना जन्म घुट - घुट के जिया करता है?
इसलिए तो शायद कोई...
इसलिए तो शायद कोई आत्महत्या किया करता है
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