Wednesday, July 8, 2009

दे दो

मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो

रोक नही पा रहा हूँ आकाल से त्रस्त उन्माद को हृदय में
मुझे अपने स्पर्श से उत्पतित थोडी नमी दे दो

कही तुमने अपने करों के द्वार फैलाये तो होंगे
भीतर आने को व्याकुल मुझे आतुर रौशनी दे दो

संघर्षों के फेर में भटके अपरिचित घोषित हो चुका हूँ
अब तो आगंतुक दृष्टि में विचरित चांदनी दे दो

सिमित नही होता है किसी की आशाओं का पोखर
भर सकूं जहाँ उज्जवल निधि वहीं दे दो

मेरी मृत्यु के बदले मुझे थोडी ज़मी दे दो
ऐसा करो अपने दिल में कहीं दे दो

1 comment:

Pavil said...

Amazing imagery !!! Jiyo yaar !! Kya baat hain !!!