Thursday, July 16, 2009

शाम की सैर

एक शाम सैर को निकले
गलियां सुनसान थीं कूचे सुनसान थे
रास्ते तो ऐसे खाली पड़े थे
जैसे आने वाले कोई तूफान थे

थोड़ा आगे चले तो समझ पड़ा कि
मंत्री जी के रूप में आए शहर के मेहमान थे
वो तो कुर्सी मचकाए आधी नींद में पड़े थे
और लाऊड स्पीकर में हो रहे उनके गुणगान थे
कहीं खलल उनकी नींद में ना हो जाए
इसलिए घेरे उनको खड़े कई पहलवान थे

और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
मन्दिर के बाहर हो रहे कुछ विधान थे
बीच में आग जल रही थी और
चारों तरफ़ पंडित लोग विराजमान थे
जाप तो वो मंत्रों का कर रहे थे पर
आने वाले चढावों पर उनके ज्यादा ध्यान थे

और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
कच्ची बस्ती में कुछ टूटे फूटे मकान थे
बाहर बच्चे नंगे भीख मांग रहे थे पर
हर घर में टीवी फ्रीज जैसे सामान थे
मासूम बेचारे हाथ फैलाये खड़े थे
और गालों पे उनके आसूँओ के निशान थे

और थोड़ा और आगे चले तो देखा की
शहर के बाहर खेत और खलियान थे
औरतें कुँए पर पानी भर रही थीं
और अपने हल को ले के जुटे कुछ किसान थे
उनकी मेहनत से खेत ऐसे लहलहा रहे थे
जैसे कृष्ण की रासलीला के लिए बने ये ही उद्यान थे

थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
सड़क के एक तरफ़ जंगल और एक तरफ़ शमशान थे
चलते चलते ठोकर लगी एक हड्डी से
तो हड्डी के ऐसे कुछ बयान थे
कि संभल के चलो ए इंसान
हम भी कभी इंसान थे

4 comments:

shiven said...

solid scenario escription oftodat's era...........

Pavil said...

Wonderful !!!!A true depiction of times !! bravo !!

Unknown said...

excellent..A very true description of what a common man feels usually, but not able to express..your choice of words to describe a scenario and them rhyming them with properly..wow..amazing man!!!..keep it up

pinchhitter said...

very good .. superb ..