इक धमाके से कैसे बदल जाती है जिंदगी
कांच के टुकडो की तरह बिखर जाती है जिंदगी
अपने काम को जाते लोग पलट जाते हैं
जाने वो लोग कौन हैं जो ऐसा करने निकल आते हैं
मेरे गांव में भी हुआ था धमाका
जहाँ मेरा घर था उस सड़क के किनारे
सूख गयी थीं रौशन गलियां
और जल पड़े थे दिल लोगों के
अब मैं तो नहीं हूँ वहां पर
कभी कभी इक टीस सी उठ आती है
और याद आता उस फूलवाली का चेहरा
जो बैठा करती थी उसी किनारे
हर शक्ल में इक शक्ल को ढूंढ़ना
अब तो ऐसी आदत सी बन गयी है
हर आती जाती चीज़ को सहम के देखना
और सोचना कोई छिपा तो नहीं बैठा उस पेड़ के किनारे
दुःख तो बहुत होता है
और मन भी बहुत करता है कुछ कर गुजरने को
पर परिस्थितियों के शिकंजे में बेबस सा पाता हूँ खुद को
और फिर एक बार मजबूर हो जाता हूँ सोचने को
1 comment:
You are still doing wonderful job...keep it up!!
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