Friday, December 19, 2008

धमाके

इक धमाके से कैसे बदल जाती है जिंदगी
कांच के टुकडो की तरह बिखर जाती है जिंदगी
अपने काम को जाते लोग पलट जाते हैं
जाने वो लोग कौन हैं जो ऐसा करने निकल आते हैं

मेरे गांव में भी हुआ था धमाका
जहाँ मेरा घर था उस सड़क के किनारे
सूख गयी थीं रौशन गलियां
और जल पड़े थे दिल लोगों के

अब मैं तो नहीं हूँ वहां पर
कभी कभी इक टीस सी उठ आती है
और याद आता उस फूलवाली का चेहरा
जो बैठा करती थी उसी किनारे

हर शक्ल में इक शक्ल को ढूंढ़ना
अब तो ऐसी आदत सी बन गयी है
हर आती जाती चीज़ को सहम के देखना
और सोचना कोई छिपा तो नहीं बैठा उस पेड़ के किनारे

दुःख तो बहुत होता है
और मन भी बहुत करता है कुछ कर गुजरने को
पर परिस्थितियों के शिकंजे में बेबस सा पाता हूँ खुद को
और फिर एक बार मजबूर हो जाता हूँ सोचने को

1 comment:

Unknown said...

You are still doing wonderful job...keep it up!!