Sunday, October 23, 2011
सफ़र
Thursday, March 31, 2011
अंतिम प्रहार
बदलने युद्ध के परिणाम को
सांस भर ले फिर ह्रदय में
थामने स्वयं के अभिमान को
हारता तो हर कोई है
समय के भर प्रहार से
घुटनों पर जा गिरता है
चेतन के चीत्कार से
समेट अपनी शक्ति सारी
फिर झोक दे बदन में
बची जो लाल बूंदें हैं
फिर छोड़ दे गमन में
टकरायेंगे तुझ से फिर
थपेड़े तूफानी पवन के
बहेगा माथे फिर लहू
गहरे दर्द और जलन से
पर तलवार ना भारी है
तेरी हार के वजन से
उर्जा तेरी कण कण जुटेगी
कर जीत के मनन से
तेज़ चेहरे का प्रखर होगा
लहू और मिटटी के सृजन से
शत्रु तेरा डरने लगेगा
तेरे कदमो की घनन से
कर दे अब अंतिम प्रहार
जो हंस रहा था तुझ पे
सिमित तेरा सामर्थ्य समझ
खुश हो रहा था विजय में
अब जा समां सकता है तू
मृत्यु के जलाशय में
अमरता है तेरी क्योंकि
हार नहीं ऐसी पराजय में
Wednesday, December 29, 2010
कुत्तों की बहस
इक बार कुत्तों में छिड़ी बहस देखो
की कौन कितना बलवान है
कौन सबसे बड़ा पहलवान है
कौन जोर जोर से गुर्राता है
कौन गली गली भुकियाता है
इतना होना काफी था उन को उकसाने के लिए
सब के सब बेताब हुए अपना जौहर दिखलाने के लिए
तब क्या था, हर कुत्ता अपना गला फाड़ने लगा
इक दुसरे को देख हर कोई जोर जोर से दहाड़ने लगा
पर उन में इक पिल्ला था भोला भला
थोडा छोटा था और था आधा काला
उस को न समझा ये खेल निराला
और बेकार लगा व्यर्थ उर्जा गंवाना
बेचारा मुहं झुका के वहां से निकला
और इक अच्छे से कोने में जा बैठा
पहले तो अंगड़ाई ले खुजलाया अपना सर
फिर शुरू किया पूछ से बतियाना
वहीं शर्मा जी दुसरे माले पे अलसाए पड़े थे
दोपहर के खाने के बाद सुस्ताये पड़े थे
मगर अब कुत्तों की जंग का शोर तेज़ होने लगा था
और शर्मा की नींद में खलल पड़ने लगा था
जब टूटी नींद तो शर्मा को आया गुस्सा आया
खिड़की खोली और चौकीदार पे झल्लाया
की ये क्या नाटक लगा रखा है
दोपहर की नींद को भी आफत बना रखा है
सुन चौकीदार ने उठाया अपना डंडा
और मचा दिया कुत्तों के झुण्ड में दंगा
सब के पिछवाड़े पे जो उस ने डंडे बरसाए
दुम दबा के भाग कुत्तों ने अपने प्राण बचाए
वो पिल्ला अभी भी बैठा सब देख रहा था
और अपनी सांस दबाये ये सोच रहा था
की जो फ़ालतू के पचड़ो में अपनी टांग अडाता है
कुछ नहीं मिलता उसे और डंडे पिछवाड़े पे खाता है
Monday, November 1, 2010
सामान
Thursday, October 21, 2010
दुविधा
क्यों इतनी असुविधा है
मेरे प्रेम के गीतों में
बोल वोही हैं, भाव वही है
मेरे मन के चिन्हों में
रूप वोही, आवाज़ वही है
कैसी निर्मल वाणी है तेरी
फिर मीठे शब्दों की आई क्यों दुर्लभता है
ऐसी भी क्या दुविधा है..
उस ने क्या देखा था हम में
वन-सघन दिए पंथ मिलाये
फिर कच्चे रस्ते पर जब चलते
उडी धुल, और मिटटी आंधी
तो गीली मुट्ठी हो जाने तक
तुने हाथ पकड़ कर साथ निभाए
अपने पैरो की ठोकर से बचते
लोग वोही हैं, हाथ वोही हैं
लगता है कि साथ है कोई
फिर वन-भर में फैली क्यों निर्जनता है
ऐसी भी क्या दुविधा है..
दूर शहर है, ठौर बहुत हैं
पग पग धुप जलेगी, प्यास लगेगी
बन के दाना, बन के जल
जीवन पर्वत तर जायेंगे
अपने प्राणों में पंखो के लगने तक
सदैव साथ निभायेंगे
मेरे हृदये की गुंजो में रहते
शब्द वोही हैं, आभास वोही है
इस सृष्टि से माँगा था ये सब हम ने
फिर तेरे वादों में आई ऐसी क्यों दुबर्लता है
ऐसी भी क्या दुविधा है..
Saturday, December 5, 2009
अमरुद का पेड़
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
छांव में घर तो बहुत बनाये उसकी
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
सहारे छोटी टहनियों के छोर चढ़ जाना
भरी मुट्ठी पत्थरों की और अमरुद नीचे गिराना
निशाने तो बहुत लगाये उस पर
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
उठा खुरपी नाम के अक्षर तने पे गोद देना
कहाँ छुपाऊ खिलौने सोचते जड़े खोद देना
भर बचपन तो बहुत सताए उसको
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
भरी दोपहर गर्मी की और चबूतरे पर सुस्ताना
हुई सर्द शाम कि सूखी पत्तियों में आग लगाना
मौसम तो अगिनत दिखाए उसको
पर बात नही कि कभी उस पेड़ से मैंने
Monday, August 3, 2009
हो रही है
खुशी की हर लहर से
पहचान हो रही है
सूरज की रंगीन किरणों से भर भर
देखो शाम हो रही है
किनारे की डाली पे बैठा पंछी
शायद हंस रहा है
उसके मन की कोई हलचल
जवान हो रही है
मेरी कश्ती में बैठा पानी
कहता रहता है
उसको पता है कैसी बातें
दरमियान हो रही है
सूरज की रंगीन किरणों से भर भर
देखो शाम हो रही है
Thursday, July 30, 2009
एक पेड़
कितने पक्षी उड़ जाते हैं
घर कितने ढह जाते हैं
फ़िर कुछ दीवाने आरी लेकर
नीचे फैला गात गठीला
टुकड़े टुकड़े कर जाते हैं
जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने पत्ते मुरझाते हैं
फल कितने सड़ जाते हैं
और बिखरी बैठी मिटटी माँ के
पालन पोषण करते दिल
उखड़े उखड़े रह जाते हैं
जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
कितने साये गुम जाते हैं
चक्षु कितने भर आते हैं
उस झुरमुट के बाकी साथी
अपने सख की पीड़ा तक
रोते रोते रह जाते हैं
जब एक पेड़ कहीं गिर जाता है
Wednesday, July 22, 2009
मेरी इच्छा
उड़ता रहता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं
चिडियों के घर को जा के सजाता
तिनको को बुन के खिलौने बनाता
करता रहता सृजन मैं
तितली के सारे फूलों से मिलता
रंगों से अपनी जेबों को भरता
खोया रहता सुगंध में
बादल के आँगन में बारिश उगाता
सागर का रस्ता हवा को दिखाता
खेला करता पवन में
तारों की झिलमिल में रातें बिताता
परियों को धरती के गाने सुनाता
गाता रहता भुवन में
ऐ काश मेरे दो पंख होते
उड़ता बनाता गगन में
तितली चिडियों की प्रेम की बातें
सुनता रहता मगन मैं
Thursday, July 16, 2009
शाम की सैर
गलियां सुनसान थीं कूचे सुनसान थे
रास्ते तो ऐसे खाली पड़े थे
जैसे आने वाले कोई तूफान थे
थोड़ा आगे चले तो समझ पड़ा कि
मंत्री जी के रूप में आए शहर के मेहमान थे
वो तो कुर्सी मचकाए आधी नींद में पड़े थे
और लाऊड स्पीकर में हो रहे उनके गुणगान थे
कहीं खलल उनकी नींद में ना हो जाए
इसलिए घेरे उनको खड़े कई पहलवान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
मन्दिर के बाहर हो रहे कुछ विधान थे
बीच में आग जल रही थी और
चारों तरफ़ पंडित लोग विराजमान थे
जाप तो वो मंत्रों का कर रहे थे पर
आने वाले चढावों पर उनके ज्यादा ध्यान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
कच्ची बस्ती में कुछ टूटे फूटे मकान थे
बाहर बच्चे नंगे भीख मांग रहे थे पर
हर घर में टीवी फ्रीज जैसे सामान थे
मासूम बेचारे हाथ फैलाये खड़े थे
और गालों पे उनके आसूँओ के निशान थे
और थोड़ा और आगे चले तो देखा की
शहर के बाहर खेत और खलियान थे
औरतें कुँए पर पानी भर रही थीं
और अपने हल को ले के जुटे कुछ किसान थे
उनकी मेहनत से खेत ऐसे लहलहा रहे थे
जैसे कृष्ण की रासलीला के लिए बने ये ही उद्यान थे
थोड़ा और आगे चले तो देखा कि
सड़क के एक तरफ़ जंगल और एक तरफ़ शमशान थे
चलते चलते ठोकर लगी एक हड्डी से
तो हड्डी के ऐसे कुछ बयान थे
कि संभल के चलो ए इंसान
हम भी कभी इंसान थे