Thursday, October 21, 2010

दुविधा

ऐसी भी क्या दुविधा है
क्यों इतनी असुविधा है
मेरे प्रेम के गीतों में
बोल वोही हैं, भाव वही है
मेरे मन के चिन्हों में
रूप वोही, आवाज़ वही है
कैसी निर्मल वाणी है तेरी
फिर मीठे शब्दों की आई क्यों दुर्लभता है

ऐसी भी क्या दुविधा है..

उस ने क्या देखा था हम में
वन-सघन दिए पंथ मिलाये
फिर कच्चे रस्ते पर जब चलते
उडी धुल, और मिटटी आंधी
तो गीली मुट्ठी हो जाने तक
तुने हाथ पकड़ कर साथ निभाए
अपने पैरो की ठोकर से बचते
लोग वोही हैं, हाथ वोही हैं
लगता है कि साथ है कोई
फिर वन-भर में फैली क्यों निर्जनता है

ऐसी भी क्या दुविधा है..

दूर शहर है, ठौर बहुत हैं
पग पग धुप जलेगी, प्यास लगेगी
बन के दाना, बन के जल
जीवन पर्वत तर जायेंगे
अपने प्राणों में पंखो के लगने तक
सदैव साथ निभायेंगे
मेरे हृदये की गुंजो में रहते
शब्द वोही हैं, आभास वोही है
इस सृष्टि से माँगा था ये सब हम ने
फिर तेरे वादों में आई ऐसी क्यों दुबर्लता है

ऐसी भी क्या दुविधा है..

2 comments:

Pavil said...

It finally came after a long wait. But It was worth the wait. Good one & quite intresting too. It does open your mind a bit & tells the reader whats going on....

Unknown said...

Be a bit more elaborative and let your readers know what are thinking about..open your heart and drop your words down..I just love your words..The way u pick them up and publish is simply amazing..This is tooo good yaar :)one of the best peoms of your's..All the best to you :)