Saturday, December 5, 2009

अमरुद का पेड़

अमरुद तो बहुत खाए उसके
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने
छांव में घर तो बहुत बनाये उसकी
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

सहारे छोटी टहनियों के छोर चढ़ जाना
भरी मुट्ठी पत्थरों की और अमरुद नीचे गिराना
निशाने तो बहुत लगाये उस पर
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

उठा खुरपी नाम के अक्षर तने पे गोद देना
कहाँ छुपाऊ खिलौने सोचते जड़े खोद देना
भर बचपन तो बहुत सताए उसको
पर बात नही की कभी उस पेड़ से मैंने

भरी दोपहर गर्मी की और चबूतरे पर सुस्ताना
हुई सर्द शाम कि सूखी पत्तियों में आग लगाना
मौसम तो अगिनत दिखाए उसको
पर बात नही कि कभी उस पेड़ से मैंने

2 comments:

Pat said...

really liked it! A touch of Nirala ji.

Pavil said...

kya baat hain kaviraj !!! Bachpan ke dekhe saare ped yaad dila diye.